Saturday, May 10, 2008
आनन्दलोक के लिये प्राक्कथन -- दिनेश शुक्ला
प्राक्कथन
प्राक्कथन
हिन्दी पाठकों के लिए मराठी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में कुसुमाग्रज का नाम सुपरिचित है। उनकी कविता राष्ट्रीय आंदोलन, राष्ट्र निर्माण के शुरुआती स्वप्निल वर्षों और बाद के स्वप्न भंग के वर्षों के पूरे काल-पटल पर फैली हुई महाकविता है। बल्कि उससे भी आगे आज के अंधकार में आशा की मशालें जलाकर आभा फैलाती हुई है।
कविता पुनर्जन्म है। मृत्यु पर जीवन की विजय है।कविता एक प्रतिकार है। एक प्रतिध्वनि है। एक प्रतिसंसार है। इन अर्थों में इस मूर्धन्य कवि की कविता भारत की पुरोगामी मानवतावादी और जनवादी शक्तियों की अपनी कविता है। वे अपने समकालीन और समानधर्मा हिन्दी कवि रामधारी सिंह दिनकर की याद दिलाते हैं। वही वाणी का मेघमन्द्र स्वर, वही गति का घर्घर नाद, वही हिमालय की तुंगता, वही समुन्द्र का आलोड़न, वही सामाजिक यथार्थ की तिक्तता, सब कुछ चिरपरिचित लगता है । तथापि इस कविता का अपना एक अलग ही आस्वाद है - लगभग उसी तरह जैसे सह्याद्रि के आमोंका, गोदावरी के जलका, पश्च्िामी घाट के वनों का और महाराष्ट्र के ओजका भारत के जीवन-वैभव में अपना अलग ही विशिष्ठ अवदान है। लीना मेहेन्दले ने कुसुमाग्रज की चुनी हुई कविताओं को हिन्दी मेंअनुवादित करके इस संग्रह के माध्यम से हिन्दी कविता की दुनिया को समृद्धतर किया हैं।
लीना मेहेन्दले हिन्दी पाठकों के लिये अनजान नहीं हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर उनके लेख विविध विषयों से हमें परिचित कराते रहे हैं। इस अनुवाद की विशेषता यह है कि लीनाजी ने हिन्दी में मराठी की सुगंध भरने की कोशिश की है। लगता है जैसे मराठी हिन्दी की उँगलियों में उँगलियाँ पिरोकर गुइयाँ-गुइयाँ कहती खेल रही हों। एक अद्भुत ताजगी भरा अटपटापन है इन कविताओं के अनुवाद में। रहिवासी, दिवाभीत, कोनशिला, अंबारी जैसे शब्दों का प्रयोग कविता के अनुवाद को अद्भुत स्निग्ध भषिक-वत्सलता से भर देता है । अजब सा और आत्मीय अनुभव है यह।
हिन्दी और मराठी सगी बहनें हैं लेकिन उनमें वही अंतर है जो गंगा और गोदावरी में, या पश्च्िामी घाट और विंध्य पर्वतमालाओं में। इस काव्यानुवाद में दो भाषाओं के तेवर मिल रहे हैं। जैसे दो समुंद्र मिल रहे हों -जैसे दाराशिकोह का मज्मुउल बाहरीन हो या फिर अमीर खुसरो के दोसुखने हों। अनुवाद की अपनी जटिलतायें होती हैं। सीमायें भी होती हैं। इनको पार कर पाना अनुवादकर्म की कसौटी है। लीना मेहेन्दले के इस अनुवाद में कुसुमाग्रज की कविता कुसुमाग्रज की ही कविता बनी रहती है - बस वह सीधे पल्लू वाली हिन्दी प्रदेश की साड़ी पहनकर हमारे मर्म का छूती हुई अपने समूचे 'निजत्व'के साथ हमारे पास चली आती है। कविता का इस तरह सीधे चले आना पाठक के पास तक उसी तरह होता है जैसे तुलसी की कविता - ''भगति हेतु विधि भवत विहाई, सुमिरत सारद आवत धाई' । ऐसा तभी संभव होता है जब अनुवादक दोनों भाषाओं के समूद्र का अच्छा नाविक हो और साथ ही कवि के मूल संवेदना की भूमि से स्वयं भी नाभितालबद्ध हो। लीना मेहेन्दले ने अपने तईं यह सिद्धि प्राप्त की है।
भारतीय कविता का मूल स्वभाव है गति, लय, लहर, नाद .........। और यही कुसुमाग्रज की कविता का भी मूल स्वभाव है। वर्तमान काल में पश्च्िामी परम्परा के अंधानुकरण वाली गद्यात्मक कविता की विषवेल हिन्दी, मराठी और अन्य भारतीय भाषाओं में फैल रही है। किंतु कुसुमाग्रज जैसे अग्रजों की कविता परम्परा के चलते यह विषवेल अधिक फैल नहीं पायेगी।
कुसुमाग्रज धरती के कवि थे। वे 'भारतीय स्वप्न'के कवि थे । उनकी कविता भावोच्छल है। बौद्विक चाकचिक्य की जटिलता से दूर, यह कविता मनुष्य के आभ्यन्तर की कविता है। इस कविता में अभिव्यक्ति की अद्भुत शक्ति के हमें जगह - जगह दर्शन होते है। नाटकीयता, मंच की दृश्यात्मकता, व्यंग्य का कटाक्ष, पाखण्ड का खंडन, लोक-कथा-गायकों का विस्तार, सभी कुछ इस कविता में मिलता है। कभी यही कविता मंत्र की तरह संक्षिप्त और आवेश से भरी हुई बिजली सी छूकर निकल जाती है। तो
कभी किसी जुलुस में डुबोकर हमें भी उस जुलुस में शामिल कर लेती है और धीरे-धीरे विशाल प्रवाह बन कर बहा ले जाती है। मजे की बात ये है कि इस अनुवाद को पढ़ते समय आपको लगातार मराठी कविता का प्रभा मंडल घेरे रहता है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि अनुवादक ने कविता के मूलरूप के साथ जरा भी छेड़खानी की हो।
कुसुमाग्रज कवि ही नहीं एक बड़े एक्टिविस्ट भी थे। और यह एक्टिविज्म उनकी कविता को हमारे अपने समय में और अधिक प्रासंगिक बनाता है- खासकर अब जब कि साम्राज्यवाद और धार्मिक कट्टरता के कबीलों ने न केवल भारत की भौतिक सीमाओं पर बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक सीमाओं पर भी अपने हमले तेज कर दिए हैं।
मराठी कविताओं के हिन्दी अनुवाद का यह संग्रह कई अर्थों में अद्वितीय है। पहले तो यह कि आधुनिक मराठी साहित्य को सिर्फ़ एक विशेष प्रकार के साहित्य तक ही सीमित कर देने का रिवा.ज सा इधर हिन्दी में चल पड़ा है। उससे हट कर यह अनुवाद एक बड़े फलक वाले मराठी रचनाकार को हिन्दी जगत से फिर रूबरू करता है जिसके कृतित्व में समाज के सभी पीड़ित वर्गों के सुख - दुख, आशा - आशंका, अनुभव को अभिव्यक्ति मिलती है। दूसरे यह रचनायें घृणा के विषवमन का अभिषेक नहीं हैं बल्कि इनमें अन्याय, अत्याचार, शोषण के विविध रूपोंको बेनक़ाब करने और उनसे भिड़ने की प्रबल ऊर्जा विद्यमान है। इनमें कहीं भी बनावट या कृत्रिमता नही है, है तो बस एक आंतरिक उल्लास। यह अपने परिवेश से ही उगती हुई कविता है, बाहर से आयातित की हुई नही। इसमें कहीं उद्बोधन है जैसे स्तंभ, स्वतंत्रता देवी की विनती, रहिवासी में । कहीं गोष्ठी, सत्संग चर्चा और भक्त परंपरा का समर्पण भाव भी - जैसे सुना था, तुकया, आलम्बन, पग चिह्न में । मुग्ध करती रहस्य छाया की अर्ध-स्मिती है- फिर जाऊँगा , कभी मन चाहे में । व्यंग्यका नमूना है लैला मंजनू, लॉ एण्ड ऑडर , अहो भाग्य में। तो रोमान्स है - सातवाँ चम्मच, आईना में। कुसुमाग्रज ने गहरी ऐंद्रिकता की कविताएँ भी लिखी हैं जिनका अनुवाद लीनाजी ने नहीं किया है। लेकिन उनकी कुछेक झलकियाँ मिल ही जाती हैं गुनाह और वृक्ष जैसी कविताओं में। 'जाते जाते' , 'जीवन' आदि मंत्र सी संक्षिप्त कविताएँ भी है और मोह भंग की कविताएँ - आखिरी कमाई, वन्दे - एक नाटयप्रसंग । गर्भ-गृह में भक्तिके उन ठेकेदारोंको बेनकाब किया है जो दावा रखते हैं कि वे तय करेंगे कि कोढियों, अछूतों के बीच जाकर रहे भगवान को गर्भगृह में वापस आने की अनुमति वे देंगे या नहीं।
मुझे पूर्ण विश्र्वास है कि खाँटी भारतीय परंपरा के साथ-साथ आधुनिक बोध वाली इन कविताओं के रसास्वादन से हिंदी साहित्य के पाठक अपनी संवेदना के क्षेत्र को अधिक विस्तृत और उदार बना सकेंगे। हिंदी कवियों को भी यह अनुवाद-संग्रह एक ताजी हवा का झोंका बनकर भाव-स्फूर्ति देगा।
दिनेश शुक्ला
1 मई, २००३
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Sunday, January 27, 2008
लोकार्पण मराठी कवि कुसुमाग्रज की कविताओं के कैसेट,वेबसाइट
मराठी साहित्य के सूर्य थे कुसुमाग्रज
-मनोहर जोशी , लोकसभा अध्यक्ष
गत १४ अगस्त को नई दिल्ली में मराठी के प्रसिद्ध कवि श्री कुसुमाग्रज की कविताओं के हिन्दी अनुवाद की पुस्तक आनंदलोक, इसके कैसेट और अंत:क्षेत्र (वेबसाइट)का लोकार्पण लोकसभाध्यक्ष श्री मनोहर जोशी द्वारा किया गया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, दिल्ली द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के अध्यक्ष थे केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री श्री राम नाईक। पुस्तक में श्री कुसुमाग्रज की १०८ कविताओं का हिन्दी अनुवाद है। इन कविताओं का अनुवाद श्रीमती लीना मेहेन्दले ने किया है। कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री मनोहर जोशी ने कहा कि कुसुमाग्रज मराठी साहित्य के सूर्य थे। कार्यक्रम में आचार्य विद्यानिवास मिश्र, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष श्री महेशचंद्र शर्मा सहित अनेक साहित्यिक, सामाजिक विभूतियां उपस्थित थीं। ..कैलाश वैद्य
पांचजन्य दि. 7-9-2003
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- Akhtar Sayyad, Rajendra Yadav and 2 others like this.
- Satappa Chavan Hindi-Marathi bhasha vikas ko aap ne pahale se hi apane jeevan ka anga banaya....aap ko dhanyavad.
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Friday, October 26, 2007
कुसुमाग्रजांच्या कविता ---- अनुवाद करतांना --मराठी आलेख
माणसाकडे संधी येते आणि खूप उशीरा कळत की आपल्या हातून त्या संधीच चीज करण्याच राहून गेल. 1995 मधे नाशिकला डिविजनल कमिशनर म्हणून माझ पोस्टिंग झाल तेंव्हा असच काहीस झालं.
रुजु झाल्यानंतर लौकरच मी तात्यासाहेबांना भेटायची संधी घेतली. ते फार मोठे कवि आहेत, त्यांनी कांही नाटक पण लिहिलीत (विशेषतः नटसम्राट), त्यांचे लेख व त्यांच्याबाबतचे लेख वर्तमानपत्रांत येतात, आणि त्यामधे त्यांचे स्वभाषेवरील विचार, शासकीय अनुदाने, बक्षीसे, इत्यादि बाबत मते, एवढेच वाचले होते. ते फार अबोल आहेत, व त्यांचे कांही खास मित्र सोडले तर एरवी संकोची आहेत अशीही समजूत झालेली होती. त्यांची नितांत सुंदर प्रार्थना सर्वात्मका सर्वेश्वरा शाळेत म्हणायची नाही वगैरे वादही तेंव्हा चालू होते. माझ्याकडे कवितेबाबत थोडी रसिकता आहे पण जे कांही काव्य-वाचन झालेल ते बहुतांशी हिंदीतून। तात्यासाहेबांच्या कविता वाचून काढून मगच त्यांच्याकडे जाव अस कांही सुचल नाही. त्यामुळे ज्या साहित्य प्रांतात ते एवढे मोठे, त्याबद्दल आपण कांय बोलणार अशी एक शंका मनात होतीच.
त्यांना भेटल्यावर जी चर्चा झाली ती आजच्या समाज-मूल्यांवर. देशांतील नागरिकांची जागरूकता आणि प्रबुद्धता कशी वाढवावी, कशी टिकवावी इत्यादि मुद्यांवर. पण ती छोटीशीच चर्चा होती.
त्यानंतर जळगांव स्कॅण्डलच्या निमिताने व नंतरही माझे प्रशासकीय दृष्टीकोन सांगणारे लेख अधून मधून प्रसिद्ध व्हायचे त्यावेळी कुठून तरी ऐकायला मिळायचे की तात्यासाहेबांना तुमचे लेख आवडतात. पण ही 'सांगोवांगी' वार्ता म्हणून मी कांही मनावर घेतल नाही.
त्यांच्या भेटी अधून मधून होत राहिल्या. एका भेटीत मी केलल्या एका बंगाली कवितेचा मराठी अनुवाद त्यांना आवडला अस ते म्हणाले. माझ्या आवडीच्या कांही हिन्दी कविता त्यांना ऐकवल्या. मी मधून मधून हिंदीतही लिहिते हे ही सांगून झाल. पण त्यांच्या कविता हिंदीत अनुवादित कराव्या अस कांही वाटल नाही. तेवढी माझी प्रतिभा किंवा तयारी नाही याची जाणीव होती. तसेच त्यांच्या कवितांचे अनुवाद बहुधा झालेही असतील अशी मी समजूत करून घेतली.
एक दिवस अचानक ताकवले सरांना दिल्लीत येऊन नवनिर्मित इंदिरा गांधी मुक्त विद्यापीठाचा चार्ज घ्या अशी सूचना आली. यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विद्यापीठाची धुरा माझ्याकडे सोपवून ते गेले देखील. त्या काळी नाशिकमधील वनवासी भागामधे तात्यासाहेबांची संस्था मुक्त शाळेसारखेच कार्य करीत असे. त्यामुळे चर्चेला तोही नवा व महत्वाचा विषय होता. त्यानंतरच्या अधिकांश भेटीत तोच विषय होता.
1997 मधे माझी पुण्याला बदली झाली, तिथून 98 मधे दिल्लीला आणि कामाच्या खटल्यात साहित्य विषय मागे पडला. पण 10 मार्च 1999 रोजी कुसुमाग्रज गेले - ते आता आपल्यात नाहीत ही बातमी आली. त्याकाळात माझ्या घरी मटा, लोकसत्ता आणि तरुण भारत घेत असे. ऑफिसमधे शेजारील महाराष्ट्र सदनमधून इतर वर्तमानपत्र वाचनासाठी मागवत असे.
तात्यासाहेबांवर भरभरून येणारे लेख त्यांच्या कविताच्या वर्णनाशिवाय कसे राहिले असते? लेख वाचतांना त्यांच्या कविता दृष्टीस पडल्या आणि वाटल, आपण इथे दिल्लीत! या कवितांची कुणाबरोबर चर्चा करायची? ती माणस तर हिंदीभाषी असणार! तरी मी कवितांचा गद्य अनुवाद पुष्कळांना ऐकवित होते, आणि एकदम वाटल- हे कवितेतही लिहून काढण आपल्याला जमेल. त्यांच्या गाजलेल्या दोन ओळी-
'समिधाच सखे या, त्यांत कसा ओलावा ............ तव आंतर अग्नि क्षणभर तरी फुलावा
समिधा सखे यह करे स्नेह क्यो सिंचन................ तव आंतर अग्नि चेते यही प्रयोजन
मूळ कविता मोठी आहे हे कळल्यानंतर त्यांत भर घातली.
'समिधा
समिधा, सखे, यह करे स्नेह क्यो सिंचन
क्यों पुष्पोंके सम दे मधुपान-निमंत्रण
रूक्षता नियति है लिख दी मैंने इनकी
तब आंतर अग्नि चेते यही प्रयोजन !
त्या लेखांमधील कविता वाचत जाण्याचा आणि जमेल तसा अनुवाद करण्याचा ध्यासच लागून गेला. त्यांच्या कांही कविता अगदी सोप्या असूनही त्यांत एक उत्कटता आहे त्यांचा अनुवाद सहजगत्या होत गेला. सुमारे सात-आठ दिवसांनी हे लिखाण थांबले. पण माझा ध्यास मात्र वाढला. दिल्लीतील महाराष्ट्र सदन व मंडळ अशा दोन्हीं वाचनालयांमधून त्यांचे कवितासंग्रह आणून वाचत गेले, तेंव्हा खरा त्यांच्या अति विस्तीर्ण कॅनव्हासचा बोध झाला. पुढील जवळ-जवळ तीन महिने मी सपाटा लावून खूपशा कवितांचा अनुवाद केला. काही अगदी छोट्या कविता होत्या--
कविता मेरी
कविता मेरी विजय के लिये कभी न थी।
इसीलिए ना चिंता इसे पराजय की।
नही जन्म के लिये कभी भी रूठी थी।
इसीलिये वह मृत्यू पर भी भारी थी।।
. सार्थक
माटीके चित्रोंको दिया तूने नाम पता
माटीके चित्रोंको दी भाव-विभोरता
हृदय तेरे सार्थकता प्रगटी जब ऐसे
माटीके चित्रोंने, देव! अश्रु दिये तुझे.
धर्म
दे मन को निर्भयता, अंतर को भाव-सृजन
प्रज्ञा का दीप जल उज्जवल हो ये जीवन
जुल्म, पाप से बैर, विफलता में अचल धीर
मानवता बनी रहे परम-धर्म-संहिता.
रडगाणी सोडून द्या अस सांगणारी त्यांची एक कविता आहे, आदेश. कळीचा हक्क काय तर सौंदर्याचा दिमाख, नखरे व सुगंधाची लयलूट करणे. सूर्याबातच्या पृथ्वी-शुक्र संवादातही पृथ्वीचा तोच सौंदर्यशील तोरा आणि ऐश्वर्य आहे. घोर अन्याय घडतो तेंव्हा एकदाच नव्हे तर पुन्हा पुन्हा स्तंभांमधून नरसिंह प्रकट होतील ही ललकार आहे. अर्जुनाला निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन सांगणाऱ्या कृष्णाप्रति त्यांचे आव्हान आहे कि भले तू मला मूढ म्हण- पण मला तुझे सगुणरूपच हवे - आणि हो, अशा मूढाच्या यादीत तो तुझा अर्जुनच अग्रक्रमांकावर आहे हे ही ध्यानात ठेव.
हो गुलाब या कमल कली हो, या नाली पर खिली कली
बाट जोहता होता उसकी प्रकाश कण एक सूरज का .....
आणि
हाँ मूढोंकी सूची में
नाम मेरा भी है,
और साथ एक सांत्वन ...
जिस अर्जुनके लिये
सुनाई गीता तुमने
सूचीमें है उस अर्जुनका
अग्रक्रम !
ध्येयासक्ति बाळगणारी माणस ही तात्यासाहेवांचे लाडके हिरो असत. सुखवस्तू माणसाला हा ध्येयवेडेपणा कसा कळणार? अशी एक छानशी कविता आहे
क्यों
....... सुकरात भी क्यों विषभरा प्याला लगाये होंठ से?
तत्व च्युत होना नही है, मौत, तू लग जा गले!
घासकी हो रोटी, सोनेको शिलाएँ हों कठिन,
क्यों महाराणा प्रतापी जंगलोंमें ही फिरे?
रोग संकट कोई ओढे कुष्टरोगीके लिये क्यों?
कोई सरहद पर हिमालयको बचाने क्यो लडे?
करो समझौता सुखोंसे, रहो घरमें चैनसे
मंत्र यह जाने न जो, क्यों बुद्धिमान उसे कहें?
न्यूटनने म्हटल होत की ज्ञानाचा सागर अफाट आहे, त्यांत मी वेचतो ते निव्वळ वाळू-कणांइतके छोटेसे ज्ञान भांडार आहे. कुसुमाग्रजांनी देखील अफाट, असीम विश्वात माणसाचे छोटेसे स्थान आणि तरीही अनंत विश्वाला गवसणी घालायची ऊर्मि काही कवितेत मांडून ठेवली आहे. पक्षी, सूर्य, कोकिळा, नक्षत्रगण, आकाश अशी त्यांची आवडती रूपके होती.
कुसुमाग्रजांनी देखील अफाट, असीम विश्वात माणसाचे छोटे से स्थान या दोन कवितेत मांडून ठेवले आहे-
रहिवासी
रहिवासी तो हैं ही हम
मली मुहल्ले, गांव के,
और अपने प्रांत के,
और अपने देश के।
लेकिन यह याद रहे
कि रहिवासी भी है हम
सौर मंडल में,
पृथ्वी नामक ग्रह के।
और वह ग्रह भी जहाँ
बालू कण जैसा क्षुद्र
उस असीमित विश्व के।
दुसरी कविता थेंब अशी आहे ---
ओसकण
अनंतताका गहन सरोवर
मंझधारे में विश्वकमल है,
खिला सनातन।
कमल पंखुडी पर
पडा हुआ है,
एक ओस-कण।
उसके झिलमिल कंपन को
हम धरती के वासी मानव,
कहते जीवन !
पक्षी या त्यांच्या प्रिय रूपकावर ही कनिता --
आज दोपहर
यह पंछी तो, बैठा मेरे सम्मुख था, आज सकारे।
उषःकाल के नभ का टुकडा, उतर पडा था मेरे द्वारे।
अगम शक्ति ने, दान दिये जो, आंचल मेरे।
एक कौतुक तो उनमें से यह पंछी भी था।
पर कौन शिकारी, आज दोपहर,
क्रूर कर्म कर गुजर गया था।
विद्ध-शर-छाती लिये यह,
मृतक पडा था।
कोलंबसाचे गर्वगीत या शिवाय कोलंबसावरच दुसरी कविता किनारा अशी आहे --
लो आया किनारा
तट पे है गूँजा नाविकों का इशारा
लो आया किनारा।
उन्मत्त तूफानी सागर विकराल
उतारी थी नौका, ताने थे पाल,
किया अनसुना भीरुओंका पुकारा,
लो आया किनारा।
वो संग्राम अब पूर्ण होने चला,
युगों की तपस्या की है सिद्धता,
वीरोंके श्रमने है जिसको निखारा
लो आया किनारा।
तट पे हैं झिलमिल पंक्तियाँ दीप की,
शलाका लाल पीली या नीलाभ की,
तमपे है खिलता जैसे अंगारा
लो आया किनारा।
इस एक क्षण की थी की हमने आस
इसीसे हुआ सिद्ध नौका प्रवास,
आये हैं वापस जग जीत सारा,
लो आया किनारा।
जो बिछडे हैं संगी उनको प्रणाम,
उनकी स्मृति रह न जाए अनाम
जयध्वज चढाओ तट पर हमारा
लो आया किनारा।
अशा खूप कवितांचा अनुवाद केला. कित्येकांना ऐकवल्या. त्यांत हिंदी-भाषी होते तसे बरेच मराठी भाषीही होते. हिमप्रस्थ, हंस, अक्षरपर्व, देवपुत्र अशा मासिकांमधूनही चार-सहा, चार-सहा कविता येेत गेल्या. एका मल्याळी व्यक्तिने हिंदी अनुवाद वाचून मल्याळीत अनुवाद करत असल्याचे सांगितले तसेच एका पंजाबी संपादकांनी पांच कवितांचा पंजाबीत अनुवाद केला. दिल्ली दूरदर्शनवर तीन वेळा कवितावाचन झाले पैकी एक कार्यक्रम सकाळ दैनिकाच्या विजय नाईक यांनी घेतलेली मुलाखत असा होता. तसेच तीन-चार कार्यक्रम दिल्ली आकाशवाणीवरही झाले. करीत करीत 108 पेक्षा अधिक कवितांचे अनुवाद झाले.
आता शोध सुरू झाला तो प्रकाशनासाठी कांय करावे याचा. पण तत्पूर्वी हिंदीतील कांही प्रथितयश कवींबरोबर चर्चा करावी असे वाटले. माझ्या ओळखीतील तीन कवींबरोबर कविता-वाचनाचा कार्यक्रम झाला. दिनेश शुक्ल व केदारनाथ सिंह यांनी कांही बदल सुचवून अनुवादाला समृद्ध केल. मी व लक्ष्मीशंकर बाजपेयींनी त्यातीत 40 कवितांचे स्टूडियो रेकॉर्डिंगही केले.
प्रकाशकाचा शोध घेताना माझी गााडी बिरला फाउंडेशनचे प्रमुख वार्ष्णेय यांच्यापर्यंत आली. त्यांनी सांगितले की ज्ञानपीठ पुरस्काराच्या समयी तात्यासाहेबांच्या कांही कवितांचा अनुवाद होऊन पुस्तक छापले गेले आहे. चक्क इसी माटीसे हा अनुवाद-संग्रहच माझ्या हातांत ठेवला. श्री चंद्रकांत बांदिवडेकर व तीन इतर मिळून केलेले अनुवाद होते. सुदैवाने चार-सहा वगळता मी निवडलेल्या कविता अगदी वेगळ्या निघाल्या. हिंदी साहित्य-अकादमी व ज्ञाानपीठ दोन्हीकडे प्रयत्न करून त्यांना फार उशीर लागतो हे लक्षांत आले. दिल्ली साहित्य अकादमीने मात्र प्रकाशनार्थ अनुदान देऊन पुस्तक छापण्यास हातभार लावला. आनंदलोक या नावाने संग्रह प्रकाशित झाला. त्या आधी पुण्यातील तात्यासाहेबांचे मराठी कवितासंग्रहांचे प्रकाशक कॉण्टिनेंटल व प़ॉप्युलर प्रकाशनाची परवानगी पण घेतली कारण मराठी पुस्तकांचे हक्क त्यांचेकडे होते.
या प्रकाशनाआधी कधीतरी जेएनयूमधील मराठी प्रोफेसरांच्या मित्रत्वात असलेले हिंदीतील दिग्गज साहित्य समालोचक नामवरसिंह यांनी (मराठी येत नसूनही) कुसुमाग्रजांच्या कविता थोर वगैरे नव्हे - सामान्यच होत्या असे म्हटल्याने मटामधे त्यावर खूप उलटसुलट चर्चा झाली होती. मी मुद्दाम त्यांची वेळ घेऊन दिनेश शुक्लांना सोबत घेऊन त्यांना भेटले व काही अनुवाद ऐकवले. त्यावर त्यांनी उत्तम कविता व उत्तम अनुवाद असल्याचे सांगितले. कोलंबसाचे गर्वगीत मधील – अनंत अमुचि ध्येयासक्ती अनंत अन आशा, किनारा तुला पामराला - या ओळींचा अनुवाद (आधीचा संदर्भ घेऊन) -
अनंत अपनी ध्येयासक्ती और अनंत आशा।
तुझ पामरके लिये किनारा, मुझ नाविक को दसों दिशा।।
त्यांना ऐकवला. तो ऐकून (समजून) क्या तेवर हैं इस कविके असे उद्गार काढले. त्यांना जेंव्हा आठवण करून दिली तेंव्हा म्हणाले - या त्यांच्या कविता मला कुणी ऐकवल्याच नव्हत्या. असो.
दिल्लीत श्री राम नाईक पेट्रोलियम मंत्री व श्री मनोहर जोशी लोकसभा स्पीकर होते. त्यांना पुस्तक भेट देतांना श्री नाइक यांनी विचारलं -- मग प्रकाशन समारंभ कधी करता आहात? मनांत म्हटलं हे छान - प्रमुख अतिथी आपोआप मिळून गेले आहेत. अशा रितीने त्या दोघांच्या हस्ते प्रकाशन समारंभही झाला, त्याला नामवरसिंह आवर्जून उपस्थित होते.
माझे एक मराठी सहकारी महेंद्र चांदोरकर यांनी कुसुमाग्रज कविता या नावाने एक वेबसाईट बनवली. तसेच मी व बाजपेयींनी वाचन केलेल्या कवितांची रेकॉर्डेड कॅसेटही प्रकाशनार्थ ठेवली. कुसुमाग्रज हिंदीमें या माझ्या ब्लॉगवर तसेच यूट्यूबवरही यातले बरेच साहित्य ठेवले आहे.
तर अशाप्रकारे कुसुमाग्रजांच्या कवितांचा हिंदी अनुवाद आनंदलोक कवितासंग्रह माझ्याकडून घडून गेला. हे सगळं जणू काही कोणीतरी माझ्याकडून करवून घेतलं असच मला अजूनही वाटत रहातं कारण त्यानंतर मला पुन्हा कविता अनुवादाच्या प्रांतात फारसे डोकावता आलेच नाही.
त्यांची खूपदा खूप जणांना ऐकवलेली ही कविता -
गाते गाते जाऊँगा मैं,
जाते जाते गाऊँगा मैं,
जानेपर भी नील गगनके
गीतोंमें रह जाऊँगा मैं।
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Wednesday, October 10, 2007
विशाखा से -- रे नन्हें पंछी
विशाखा से
रे नन्हें पंछी
है चलना वापस नन्हें पंछी,
वापस चलना आज
अस्तगिरि पर क्षण क्षण उतरे
अंधियारी ये सांझ।
सुवर्ण नौका रश्मिरथी की
विलीन हो सागर में,
है देर जरासी, बैठ मेरे संग,
गीत मधुर कुछ गा लें।
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Friday, October 5, 2007
विशाखा से -- प्रकाश - प्रभू .........
तेजोमय घट उँडेल कर
रविराजा के अग्रदूत
खोल पूर्व के महाद्वार को
आए क्षितिज पार से।
उनके पीछे उदयगिरि से
विश्र्व चराचर का जीवन
ले स्वर्ण करों में, आई
मूर्ति परमेश्र्वर की।
प्रभू के आरुण मंगल पद
लागे ज्यों ही धरती पर,
लहरें उठीं अग्नि रस की
भू, जंगल, नद, नदियों पर।
देव हस्त का होता स्पर्श
मेघखंड भी होय दुभंग
उज्ज्वल रश्मि फूट फूट कर
नभमंडल को भर देतीं।
करने को सम्राट् का स्वागत,
सजती धरती, सजते परबत
फूलों ने श्रृंगार के लिए
बचा रखे थे थोडे हिमकण।
प्रभू मेरे भी हृदय पटल पर
चरण धरो अपने ये पावन
अंधियारी रात्रि है अबतक
निराश मन को जडे हुए।
तेरे चरणों का हो अंकन
उजियाला हो मेरा जीवन
फिर न कभी विचलित कर सकतीं
घोर तमों की लाखों रातें।
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Thursday, October 4, 2007
विशाखा से -- यह बाट.....
यह बाट जा रही
बिकट वनों से,
ढल रहा क्षीण विधु,
गगन पटल से।
इस तम में
बन कर पिशाच
घूमे हवा।
पर दूर तेरे घर
जलता है
कोई दिया।
उसके ही आसरे,
राह मेरी कटी,
राह मेरी कटी।
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