Sunday, March 14, 2010

छन्दोमयी से -- दूर

दूर

चाहता हूँ
तुम्हारा अपार दुख
बाँहों में समेट लूँ।
छाती पर टिकाकर,
जलन उसकी
बुझा दूँ।
पर मेरी बाँहों से
तुम दूर हो
हजार शपथों से।

छन्दोमयी से -- चार्वाक

चार्वाक

' जो मैंने जाना
वही एक सच्चा है,
जो मुझे सुख दे
वही एक अच्छा है '
तेरा यह कथन,
जहाँ अहं है सार्वभौम,
मानता हूँ मैं भी,

लेकिन एक मर्यादा तक।
आदमी का मैं जहाँ
फैला दस दिशाओं में
वहाँ मेरे ओर तुम्हारे
रास्ते बदल जाते हैं।
क्यों कि वहाँ सारे 'मैं'
'हम'में घुल मिल जाते हैं।
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छन्दोमयी से -- भीड

भीड

महाप्रलय की विकराल लहरों से
एक एक बूँद अलग कर देखी
तो किसी न किसी दूब पर
वह कभी थरथराई थी।

बिजली के भीषण तांडव से
एक एक किरण अलग कर देखी
तो किसी गुलाब पँखुडी पर
वह कभी झिलमिलाई थी।

निर्दय क्रोध में दौड रही भीड से
एक एक आदमी अलग कर देखा
तो करुणा उसके हृदय में भी
कभी छलक आई थी॥
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छन्दोमयी से -- आनंदलोक

आनंदलोक

आनंदलोक में मेरे
चाँद डूबता नहीं
प्रेम का सागर अथाह
तांडव लाता नही।

आनंदलोक में मेरे
सदा वसंत का गान
आम्रशाखाओंसे फूटे
कोकिल की पंचम तान।

सात रंगों की महफिल,
बहती चले हवाओं पर,
यहाँ मृत्यु भी आती है,
मयूरपंखी शांति लेकर॥
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छन्दोमयी से -- आईना

आईना

आईने ऐसा नहीं करते
देखी जो छवि उसे नहीं धरते।

पर यह आईना
अलग ही निकला

कभी केश में गजरा सजाने
तुमने इसमें झाँका था।

अब यह अपवाद बना आईना
नियत समय पर,
प्रगट करता है वही रूप,
पूरी की पूरी चौकट में भरकर।
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छन्दोमयी से -- औरत

औरत

धूप में तपे पत्थर
फोडे से न फूटे
स्तन से चिपका बालक
हटाए से न हटे
अंगूठे से बही रक्त की धार
रोके से न रुके
औरत फोडती रही,
औरत फूटती रही।
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छन्दोमयी से --पालकी

पालकी

चार पाँच कोकिला
भोर भए गान कर
पंचम सुरों की
बाँधती हैं पालकी।
मरण की सीमा पर
भटके हुए मुझको,
पालकी में उठा
वापस जीवन में डालतीं॥
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