Wednesday, April 18, 2012

नंद चतुर्वेदी 7 कविताओंका मराठी अनुवाद गोपीनाथ

नंद चतुर्वेदीकी 7 कविताओंका मराठी अनुवाद --लीना मेहेंदळे (अंतर्नाद --- )
डायरी क्र 1 से यहाँ उतारें


गोपीनाथ
गोपीनाथ
गावातून शहरांत आला
डोईवर गाठोडं आहे !

त्याला आता रस्ता ओलांडायचा आहे.
समोर रस्तेच रस्ते
यातला कोणता रस्ता नाशिकला जातो ?

शहरांत येऊन संभ्रमित झालाय गोपीनाथ
डोक्यावरल्या गाठोड्याने अजून पंचाईत केलीय
थांबून थांबून माना वळताहेत
गाठोडं पाहून .....

शहरांत आता कधी कुणी पाहिलीत गाठोडी
त्यातल्या
गाठी गाठी अन् गाठी...

त्यांत बॉम्ब तर नाही?
कोण आहेस? कुठे चाललास?
पोलिस चौकी लांब नाही

एकेकाची भिती
एकेकाच्या तोंडाला सुटलेले पाणी
सगळे त्या गाठोड्याच्या गाठीत अडकलेत

कपडे बांधून गाठोड्यांत घेऊन
आला होता गोपीनाथ
गोदेत स्नानासाठी
ही यात्रा गोदेच्या निर्मळ पाण्यांत
स्नान करण्यासाठीच होती

पण कुठली गोदा?
कुठली गंगा?
सध्या तर फक्त रस्ता ओलांडायचा आहे
गाठोडं उगीच आणलं त्याने
शंका आणि तमाशा घडवणारं !
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Monday, August 8, 2011

मुक्तायन से -- याचक

याचक

एक था याचक
जिसका कटोरा
कभी नहीं भरता था।

नृपालों ने दिये
सिंहासन,
कुबेर ने डाले स्वर्ण भंडार,
फिर भी कटोरा खाली ही रहता था।

पंडितों ने शब्द दिए,
पुरोहितोंने दान-पुण्य,
साधुओंने सत्व डाला,
वीरोंने अविरत कर्म,
फिर भी कटोरे का तल दीखता था।

फिर याचक आया
एक भिखारिन के द्वार पर,
जहाँ उसका बच्चा
अधढँके स्तनों पर दूध पी रहा था।

याचक ने कहा
माई, दे दे कुछ भीख ---
माई ने वक्ष से
बच्चे को अलग किया.,
फूट रही धार से,
दो बूँद दूध का याचक को दान दिया।

लबालब भर चला
याचक का कटोरा,
अथाह सागरसा।

आज वही याचक,
कृतज्ञता में भरकर,
पृथ्वी पर सबको बाँट रहा है दुग्ध-कण।
इसी कारण,
हाँ इसी कारण,
इतना कुछ होकर भी
टिका हुआ है मानव जीवन।
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मुक्तायन से -- वृक्ष

वृक्ष

तुम ही हो वर्षा,
तुम ही हो ग्रीष्म,
मैं केवल एक वृक्ष
अंबर में धँसा हुआ।

झेलता हूँ तेरी बारिश,
तेरी गरमी,
तेरा तूफान,
भीतर तक थका हुआ॥
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मुक्तायन से -- स्वर

स्वर

सबसे मधुर स्वर
न महफिल के गाने का
न पहाडी झरने का
न कोयल के कूजन का
न सागर की लहरों का
न आमंत्रक होठों की
मौन किलकारी का।

सबसे मधुर स्वर
कहीं पर किसी के
हाथ पाँव पडी श्रृंखला
छनछनाकर टूटने का।
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मुक्तायन से -- सूर्यास्त से

सूर्यास्त से

सूर्यास्त से
ये चंद किरण
तोड लाया हूँ मैं।
आजकी असह्य,
भयानक
तूफान भरी रात के लिए।

शायद नहीं ये
देंगे प्रकाश,
नहीं जला पायेंगे
ज्योत से ज्योत।
रखेंगे केवल जागृत
सूर्योदय कल का,
तुम्हारे व मेरे
अंतस् की आशा का।
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Sunday, August 7, 2011

मुक्तायन से -- सस्ता सौदा सरकारी

सस्ता सौदा सरकारी

पैर तले रौंद कर,
जगदम्बा के समान
ग्रीष्म के दोपहर की
हिंヒा, राक्षसी धूप
बबूल के पेड तले
क्रेश में लिटाए हुए
बच्चे की बिलखती
अंतडियों की भूख
आर्तनाद से छलका
चोली में जो दूध
बाँध वापस चोली में,
प्राणांतिक आवेश में ----
फोड रही है पत्थर -----
गढ रही है कल यहाँ से
जानेवालों का रास्ता,
और परसों
देश में जन्मनेवालों का
भविष्य।
और यह सब
रोजगार हमी योजना के
तीन रुपयों में केवल।
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मुक्तायन से --संवाद

संवाद

जब आप
बातें करें मेरी कविता से
तो मुझसे ना बोलें।
क्यों कि मेरी कविता में
मैं भी हूँगा थोडा बहुत
पर मुझसे बातें करने में
केवल आप ही होंगे शायद
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