Sunday, November 11, 2012

किला -- एडविन मूर की स्कूल-फेव्हरिट कविता The Castle का भावानुवाद

किला
-- एडविन मूर की स्कूल-फेव्हरिट कविता The Castle  का भावानुवाद जो 26/11 की रात में कभी किया था।
हम किले पर रहते थे |मजबूत दीवारों का अभेद्य किला
बुर्जों पर चौकसी करते हुए
हमें कोई तनाव न था |
हमें दीखते थे सामने फैले
विस्तृत मैदान
और वहीं झाडियों में छिपा हमारा शत्रु
वे हमें क्योंकर जीत पाते ?
हमारे पास शस्त्र-अस्त्र थे भरपूर
हमारे सैनिक जाँबाज - शूर
और मैदान पार के रास्तों पर
निश्चित रुप से पास आ रही थीं
हमारे मित्र देशों की सेनाएँ |
पर हाँ ....
हमारे किले के कोने में एक छोटा मायावी द्बार था |
द्बारपाल ने एक दिन उसे खोल दिया |
शत्रु उसी रास्ते से आया |
बिना लडे ही हमपर जय किया |
शर्म की बात, पर सच्चाई की है |
सोने का हथियार
लोहे के हथियार पर भारी है |
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Saturday, November 10, 2012

पसायदान


पसायदान

आता विश्वात्मकें देवें ।    येणे वाग्यज्ञें तोषावें ।
तोषोनिं मज ज्ञावे ।    पसायदान हें ॥
अब विश्वात्मक देव को नमन । होता वाग्यज्ञका समापन ।
तुष्ट हों दें मुझे दान । पसाय का ।।

जें खळांची व्यंकटी सांडो ।    तया सत्कर्मी- रती वाढो ।
भूतां परस्परे पडो ।    मैत्र जीवाचें ॥
कि दुष्टोंकी दुष्टता हटे । सत्कर्मोंमें चित्त लगे।
परस्परोंमें प्रीत बढे । मैत्र- भावसे ।।

दुरितांचे तिमिर जावो ।    विश्व स्वधर्म सूर्यें पाहो ।
जो जे वांच्छिल तो तें लाहो ।    प्राणिजात ॥
दुरितोंका तिमिर छटे । विश्व स्वधर्म सूर्य देखे ।
जो जो चाहे, वही लहे । प्राणी जात ।।

वर्षत सकळ मंगळी ।    ईश्वरनिष्ठांची मांदियाळी ।
अनवरत भूमंडळी ।    भेटतु भूतां ॥

चलां कल्पतरूंचे आरव ।    चेतना चिंतामणींचें गाव ।
बोलते जे अर्णव ।    पीयूषाचे ॥


चंद्रमे जे अलांछन ।    मार्तंड जे तापहीन ।
ते सर्वांही सदा सज्जन ।    सोयरे होतु ॥
चंद्रमा ज्यों अलांछन । मार्तंड ज्यों तापहीन ।
ऐसे सबोंको सज्जन । सगे होवें ।।

किंबहुना सर्व सुखी ।    पूर्ण होऊनि तिन्हीं लोकी ।
भजिजो आदिपुरुखी ।    अखंडित ॥

आणि ग्रंथोपजीविये ।    विशेषीं लोकीं इयें ।
दृष्टादृष्ट विजयें ।    होआवे जी ।

येथ म्हणे श्री विश्वेशराओ ।    हा होईल दान पसावो ।
येणें वरें ज्ञानदेवो ।    सुखिया जाला ॥
श्री विश्वेश्वरने तब कहा । यही तुझको पसाय दिया ।
इस वर से ज्ञानदेव हुआ । सुखिया सुखिया ।।
सुखिया सुखिया ।  सुखिया सुखिया ।।
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Sunday, October 28, 2012

कुसुमाग्रजांचे इतर काही अपूर्ण अनुवाद

कुसुमाग्रजांचे  इतर काही अपूर्ण अनुवाद
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हे कुसुमाग्रज, आप
वासी हो गगनों के
पर कृतार्थ कर रख्खी
माटी मराठी की।
-- वसंत बापट यांनी वाहिलेली श्रद्धांजली
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रे अनन्त है मेरी ध्येयासक्ति
और अनन्त है मेरी आशा
किनारा तुझ पामर के लिये
मुझ नाविक को दसों दिशा
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पंढरी के राय जी
हे त्रिलोकपाल जी,
क्या तेरी गत बनी
तेरे ही धाम में
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अमर्याद है मित्र तेरी महत्ता
मुझे ज्ञात मैं एक धूलीकण
पखारनेको  फिर भी तुम्हारे चरण
ये धूली ही है मेरा आभूषण
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गोप
कौन फिरे गोप इस अपार चराई में
बाँसुरी की तान चढी गगन की उतराई में।
सुनकर संगीत नाद
झूमे धेनु मगन
अगणित आनंद लहरी मूर्त होतीं सघन
मिटे प्यास मिले छाँव आकाश की नदिया में
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अपूर्ण
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मार्ग
चल रहा हूँ चल रहा हूँ
 अंत चलने का नही है
चल रहा हूँ किधर क्योंकर
प्रश्न यह बाकी नही है।
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इसलिये छोडी है मैंने
आस भी अब मंजिलोंकी
श्रेय चलने का है केवल
धर्म अब दूजा नही है।
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अनुवादासाठी ठरवलेल्या इतर कविता
गुराखी (गोप)
उषासूक्त
खंत नाही तुला
इंदु-बिंदु ची कविता
चार कोळसेवाले
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Friday, October 26, 2012

शिवबांच्या राज्यांत September 6, 2012




शिवबांच्या राज्यांत


शिवबांचे नांव जपत
शिवबांचा वारसा सांगत
दारु गाळतात कुणी कुणी
अन्नाची नासाडी करून
गरीबाचा घास पळवून
अन् हाकारतात कोवळ्या कळ्यांना --
या बाळांनो या
फुकट पाजतो दारु ती प्या
बेधुंद होऊन नाचा
बिघडा बाळांनो बिघडा
उद्याचे आहांत तुम्ही मतदार
आमच्या राजभोगाचे
मावळ्यांनी नाही का आपली निष्ठा महाराजांच्या पदरांत टाकली
तुम्ही पण टाकाल तुमची मते आमच्याच पदरांत
खात्री आहे आम्हाला
रायरेश्वराच्या चरणी स्वराज्य-स्थापनेची शपथ घेणा-या शिवबांची शपथ
आमच्या राजसत्तेत तुम्हाला कधीच कमी पडू देणार नाही
अशा मद्यधुंद पार्ट्या
बिघडा बाळांनो बिघडा
तुमच्या बिघडण्यांतच दिसतो 


आम्हाला आमचा सुवर्णकाळ
 
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वेडात दौडले वीर मराठे सात बद्दल September 5, 2012


Spotted this Good Deed today
वेडात दौडले वीर मराठे सात या कुसुमाग्रजांच्या कवितेचा नितान्तसुंदर अनुवाद नागपुरच्या तुषार जोशी यांनी केल्याचं माहित होते. एकदा ईमेल्सवरून आम्हीं त्याबद्दल थोडसं बोललो होतो. कारण मी कुसुमाग्रजांचा अनुवाद करताना हिचा अनुवाद मला नाही जमणार --
 करू दे कुण्या जास्त प्रतिभावंताला -- असं म्हणून सोडून दिला होता.
वीर मराठे दौडे सात दिवाने -- सुंदर चाल व गायन आत्ताच महाराष्ट्र हिंदी अकादमी च्या साइट वर ऐकले . अभिनंदन . खूप छान जमून आले आहे. अत्यंत श्रवणीय. .http://www.maharashtrahindi.org/#

  • Aparna Lalingkar Tushar Joshi, फारच सुंदर. आणि गायलं देखिल मस्तच. अभिनंदन!
  • Tushar Joshi धन्यवाद!

    फारच नवा प्रयत्न आहे तो. ऑफबीट गायन झाले आहे. आवाज छान आहे अनुवाद त्याच मीटर मधे आहे पण संगीत संयोजनाचा फार अनुभव नसल्याने रेकार्डींग नीट जमलेले नाही. हे हौशी पद्धतीने केल्याने घरी केलेले आहे.

    आता सुबोध खूप सुंदर कंपोझींग करतो तो त्याचाही नवा प्रयत्न होता.

    उषःकाल जरा अधिक बरे झाले आहे असे मला तरी वाटते
  • Manohar Ahire फारच छान....
  • Asavari Kakade मूळ चालीवर अनुवाद करणं खरच कौतुकास्पद आहे... अभिनंदन तुषार जोशी !
  • Pramod Arvind Bhatt · 2 mutual friends
    wedat marathi veer dodale saat! 1 sakhar, 2 sahakari sanstha, 3 ZP, 4 kolsaa, 5 Vyajkhau sawkari, 6 aatmahattya, 7 jaanta Raaja.















Monday, October 22, 2012

योग-मंत्र

योग-मंत्र
(२००३-०४ में कभी)
उन दिनों मैं पीसीआरए में कार्यरत थी। गीता का संदेश -- योगः कर्मसु कौशलम् -- इसे ऊर्जा बचत के साथ जोडकर  आस्था चॅनेल पर डालने के लिये एक सीरीयल के निर्माण की योजना हमारे कार्यालय ने बनाई क्यों कि कर्म-कुशलतासे ही ऊर्जा-बचत होती है। इस सीरीयल के लिये हम शीर्ष-गीत ढूँढ रहे थे।
मेरे प्रिय गायक पंडित जसराज का गाया राग कलावती मेरी अतिप्रिय श्रवण-श्रृंखला में है। इसके प्रारंभ में जो मंगल-स्तवन उन्होंने गाया है -- मंगल् भगवान विष्णुः मंगलं गरुडध्वजः..... वह कई कई दिनों तक मुझे हॉण्ट करता रहता है। जब भगवद्गीता का संदेश लेकर सीरीयल बनानेकी बात चली तब वही धुन मेरे मन में फिर प्रकट हुई और पहली पंक्ति बनी -- कर्म में हो कुशलता -- जोकि ठीक मंगल् भगवान विष्णुः की जगह फिट बैठती थी।
फिर चिन्तन करते करते अन्य ३ पंक्तियाँ भी रची गईं और हमारा शीर्ष गीत बन गया। हमारे प्रोड्यूसरने इसे श्री वाडेकरसे गवाया है जो ठीक -ठीक उसी धुन में तो नही पर बेहद श्रवणीय है।
इस सीरीयल के लिये पूरा गीता-पाठ मेरे पिताजी ने किया था । वह अब यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। उसके प्रारंभ में मैंने यह शीर्ष गीत भी जोड दिया है।

कर्म में हो कुशलता
चित्त में समदर्शिता
बुद्धि में स्थितप्रज्ञता हो
पार्थ ये ही योग है।
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Sunday, October 21, 2012

देशकी ताकत (खेमका के बहाने)

देशकी ताकत

चाहे कर दो अंधेरा हजार दिवारोंसे, 
एक छोटी लौ काफी है अंधेरा मिटानेको । 
चाहे ढँक लो अपनी करतूतें हजार परदोंमें, 
एक तेज वार काफी है उन्हें टर्रारा फाडनेको। 
जमा ली पूरी सेना विराटकी गायें हडपनेको, 
एक अर्जुन काफी था उन्हें छुडानेको। 
हडप लो देशकी मिट्टी-जमीं दामादके नातेसे, 
एक म्यूटेशन-रिवर्सल काफी है देशकी ताकत जगानेको।
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