तेरे मिलने को
तेरे मिलन की
सिद्धता है पूरी
माटी की डोरी
तोडी मैंने।
अहं का आईना
सुहृदों की थाती
पुराने बाजार में
बेच डाली।
लाख रिश्ते नाते,
उखाडी हैं जडें,
होंगे अभी सारे
धराशायी।
बही खाते सारे
किए विसर्जित
रख्खे थोडे गीत
टिप्पणी में।
वसूला थोडा सा
भारी ऋण भार
घोषित हुआ मैं
दिवालिया।
चंद्र का शारद,
सूर्य की तपन,
किया विसर्जन
गगन में।
देह का है सौध,
मन है गोपुर,
लाल बंदी-घर
वासना का।
उन्ही के द्वार पर
राजीनामा लिखा,
मुहर और ठप्पा
पूरा किया।
जीवन है कठिन,
डूबा ऊबरा मैं,
सारे का सारांश
शून्य बचा।
वर्षा का मेघ मैं
अब हुआ रीता
चलने को तत्पर
तेरे साथ।
अनुमति हो साथ
ले लूँ थोडे सुर,
शहनाई की धुन से
बिस्मिल्ला के।
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Sunday, March 14, 2010
छन्दोमयी से -- तब भी
तब भी
जब मैं न हूँगा
तब भी मैं हूँगा
तुम्हारी पलकों की
अनगढी बूँद में
और आज की तरह
तब भी कहूँगा
आज भी उसी तरह
अनगढ ही हूँ मैं॥
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जब मैं न हूँगा
तब भी मैं हूँगा
तुम्हारी पलकों की
अनगढी बूँद में
और आज की तरह
तब भी कहूँगा
आज भी उसी तरह
अनगढ ही हूँ मैं॥
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छन्दोमयी से -- सूर्यपुत्र
सूर्यपुत्र
जिनका बाप नही है
ऐसे सारे अनौरस पुत्रों में
मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ ---
सूर्यपुत्र।
मुझे आकार दिया है
सूर्य और पृथ्वी के बीच
एक अज्ञात संकेत ने।
हाँ, दिया होगा जन्म मुझे
शायद किसी पुरुष के वीर्य ने
लेकिन गर्भ के गहन अंधेरे में
लज्जाास्पद बना हुआ मेरा अस्तित्व
जब लक्षदल कमल बनकर
प्रस्फुटित हुआ,
तेजोमय हुआ,
वह तुम्हारे व्यवहार से परे,
सूर्यके आशीर्वाद से
और धरा की ममता से।
इसीलिए मैं वही कानून मानता हूँ
जिनका उगम मानव
या मानव समूह में नही
बल्कि है सूर्य के प्रकाश में
और धरती की ममता में।
केवल वही कानून मैं जानता हूँ
केवल वही कानून मैं मानता हूँ
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जिनका बाप नही है
ऐसे सारे अनौरस पुत्रों में
मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ ---
सूर्यपुत्र।
मुझे आकार दिया है
सूर्य और पृथ्वी के बीच
एक अज्ञात संकेत ने।
हाँ, दिया होगा जन्म मुझे
शायद किसी पुरुष के वीर्य ने
लेकिन गर्भ के गहन अंधेरे में
लज्जाास्पद बना हुआ मेरा अस्तित्व
जब लक्षदल कमल बनकर
प्रस्फुटित हुआ,
तेजोमय हुआ,
वह तुम्हारे व्यवहार से परे,
सूर्यके आशीर्वाद से
और धरा की ममता से।
इसीलिए मैं वही कानून मानता हूँ
जिनका उगम मानव
या मानव समूह में नही
बल्कि है सूर्य के प्रकाश में
और धरती की ममता में।
केवल वही कानून मैं जानता हूँ
केवल वही कानून मैं मानता हूँ
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छन्दोमयी से -- शुभकामना
शुभकामना
महापुरुष मरते हैं
तब जाग खडे होते हैं,
जगह जगह पर
संगमरमर के पत्थर,
और सरेआम चौराहे पर
चुन देते हैं उनकी आत्मा,
मार डालते हैं उन्हें,
फिर एक बार,
और इस बार
पूरी तरह से।
इसीलिए कहता हूँ
महापुरुष को मरना है
दो बार ----
एक बार अपने बैरियों के हाथ
बाद में अपने भक्तों के हाथ
वह संगमरमरी मृत्यु
तुम्हें नही झेलनी पडे,
यही है मेरी शुभकामना।
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महापुरुष मरते हैं
तब जाग खडे होते हैं,
जगह जगह पर
संगमरमर के पत्थर,
और सरेआम चौराहे पर
चुन देते हैं उनकी आत्मा,
मार डालते हैं उन्हें,
फिर एक बार,
और इस बार
पूरी तरह से।
इसीलिए कहता हूँ
महापुरुष को मरना है
दो बार ----
एक बार अपने बैरियों के हाथ
बाद में अपने भक्तों के हाथ
वह संगमरमरी मृत्यु
तुम्हें नही झेलनी पडे,
यही है मेरी शुभकामना।
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छन्दोमयी से -- ऋण
ऋण
माटीपन
मिटाए न मिटे,
आकाशपन
हटाए न हटे।
आकाश माटी के
संघर्ष में
मेरे जख्मों का ऋण
चुकाए न चुके।
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माटीपन
मिटाए न मिटे,
आकाशपन
हटाए न हटे।
आकाश माटी के
संघर्ष में
मेरे जख्मों का ऋण
चुकाए न चुके।
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छन्दोमयी से -- मेरे नभ
मेरे नभ
मेरे नभ एक तुम ही हो
मेरे और उसके भी गाँव,
तुम्हें ज्ञात है पूरी कहानी
देख रहे हो उसके घाव।
इस अपार दूरी में भी
मैं तेरा यह नीलापन
बाँट रहा हूँ उससे
इतना ही जीने का सांत्वन।
अपना वत्सल हाथ
घने केशों में फेर के कहना,
दूर मेरे इस गाँव में भी अब
आन चली है रैना।
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मेरे नभ एक तुम ही हो
मेरे और उसके भी गाँव,
तुम्हें ज्ञात है पूरी कहानी
देख रहे हो उसके घाव।
इस अपार दूरी में भी
मैं तेरा यह नीलापन
बाँट रहा हूँ उससे
इतना ही जीने का सांत्वन।
अपना वत्सल हाथ
घने केशों में फेर के कहना,
दूर मेरे इस गाँव में भी अब
आन चली है रैना।
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छन्दोमयी से -- मराठीपन
मराठीपन
मैने अपना मराठीपन
ढूँढना चाहा
सह्याद्रि के पत्थरों में,
संतों के शब्दों में,
इतिहास के पन्नों में।
तब वे सारे हँसकर बोले,
अरे पगले,
हमने तो ढूँढा अपना मराठीपन,
इन भूमिपुत्रों के मन में,
उनकी जखमों में,
उनके रक्त-माँस में,
जिससे निकलती हैं
सूर्य की उसाँसे,
मराठीपन को पार कर
सारे आकाश को बाँहों में भरनेवाली ------ प्रदीप्त !
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मैने अपना मराठीपन
ढूँढना चाहा
सह्याद्रि के पत्थरों में,
संतों के शब्दों में,
इतिहास के पन्नों में।
तब वे सारे हँसकर बोले,
अरे पगले,
हमने तो ढूँढा अपना मराठीपन,
इन भूमिपुत्रों के मन में,
उनकी जखमों में,
उनके रक्त-माँस में,
जिससे निकलती हैं
सूर्य की उसाँसे,
मराठीपन को पार कर
सारे आकाश को बाँहों में भरनेवाली ------ प्रदीप्त !
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छन्दोमयी से -- कणा
कणा
'"पहचाना सर मुझे ?"' कोई बारिश में आया
कपडे माटी सने, साँवला तन मुरझाया।
क्षण भर बैठा, हँसा, शून्य में तक कर बोला
मेहमान बन घर आई थी गंगा मैया।
रही आठ दिन जैसे गोरी कोई मैके आए
चार दीवारों के अंदर भी धमाचौकडी छाए।
बहा ले गई चूल्हा चौका, खाली हाथ क्या जाती
धँसी दीवारें, बिखरे सपने, घरवाली बच पाई।
छोड गई थोडा प्रसाद सा इन पलकों में पानी
शुरुआत अब फिर से करनी, फिर से नई कहानी।
घरवाली को लिए साथ घर फिर से बाँध रहा हूँ
माटी कीचड फेंक रहा हूँ, ईंटें उठा रहा हूँ।
जेब टटोली मैंने तो वह हँसता सा उठ गया
पैसे नहीं, अकेलापन सर, बाँटने को मैं आया।
उजड गया घरबार फिर भी टूटा नहीं 'कणा'
हाथ पीठ पर रख कर कहिए 'जारी रखो लडना'।
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'"पहचाना सर मुझे ?"' कोई बारिश में आया
कपडे माटी सने, साँवला तन मुरझाया।
क्षण भर बैठा, हँसा, शून्य में तक कर बोला
मेहमान बन घर आई थी गंगा मैया।
रही आठ दिन जैसे गोरी कोई मैके आए
चार दीवारों के अंदर भी धमाचौकडी छाए।
बहा ले गई चूल्हा चौका, खाली हाथ क्या जाती
धँसी दीवारें, बिखरे सपने, घरवाली बच पाई।
छोड गई थोडा प्रसाद सा इन पलकों में पानी
शुरुआत अब फिर से करनी, फिर से नई कहानी।
घरवाली को लिए साथ घर फिर से बाँध रहा हूँ
माटी कीचड फेंक रहा हूँ, ईंटें उठा रहा हूँ।
जेब टटोली मैंने तो वह हँसता सा उठ गया
पैसे नहीं, अकेलापन सर, बाँटने को मैं आया।
उजड गया घरबार फिर भी टूटा नहीं 'कणा'
हाथ पीठ पर रख कर कहिए 'जारी रखो लडना'।
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- Dhanashri Patil, Anil Mydev, Sunil Chandrakant Acharekar and 140 others like this.
- Sudhindra Kumar · Friends with Rajendra Kumar Chadhaस्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। जय हिन्द
- Chhaya Thorat आभारी लिनाजी...कितनी बडी बात कितनी सरलता से कही गई है...
जो हर किसी को हौसला दे जाती है...
जीने का हौसला..
सबकुछ खोकर भी... सब कुछ पाने का हौसला...
स्वतंत्रता दिन की आपको शुभकामनाये... - Leena Mehendale रही आठ दिन जैसे गोरी कोई मैके आये -- इसपरSanjay Bhagat ने एक बार मुझसे कहा था -- कि इस पंक्ति का अनुवाद ऐसी किसी भाषामें नही हो सकता जहाँकी संस्कृतिमें ब्याहता लडकीके आठ दिन मैके आने की, धमाचौकडी मचानेकी या नदीको एक मैके आई लडकीके रूपमें देखनेकी परंपरा न हो। भाषा संस्कृति का वहन करती है। इसीसे अंग्रेजी हमारे लिये पराई भाषा ही रहेगी। इसीसे अपनी भाषाको अग्रक्रम देना ही होगा। वरना भारत नामकी संस्कृति ही मिट जायगी।
- Vrushali Mandape nice translation ...! so simple words yet so powerful...Aashayghan...!! we would like to hear more from u mam..!!
- Kavita Kshirsagar " भारताचा स्वातंत्र्यदिन चिरायु होवो...!!! स्वातंत्र्य दिनाच्या खूप खूप शुभेच्छा...!!! जय हिंद...!!! "
- Sanjay Bhagat "वोह हस्ता हुआ उठ गया, पैसा नहीं, अकेलापन बाँटने के लिए मैं आया हूँ ".......Thanks a million Ma'am :)
- Arun Gadre I vouch from personal experience that you are a gifted translator. I am sure Kusumagraj would have loved this translated version.
- Jai Singh · Friends with Uday Prakash and 3 othersआप जीवन के उस पक्ष को खोज कर हमारे सामने ले आते हौं जिनकी तरफ हमारी निगाहें अक्सर नहीं जा पातीं
- Madhukar Verma कुसुमाग्रज की एक कविता की ये पंक्तियाँ अवसरवादी और कुर्सी केन्द्रित राजनीती के लिए सदैव प्रासंगिक रहेंगी - " गर्भगृह सलामत रहे देवता तो हजारों मिल जायेंगे"
- Manoj Dhyani · Friends with Desh Nirmohi and 3 othersमेरे लिए इस अनुवाद के अर्थ कुछ अलग तरह से खुल रहे हैं , कारण मेरे प्रदेश के उत्तरकाशी जिले में अस्सी गंगा कुछ ऐसे ही अंदाज़ में , अभी अभी मइके आकर लौटी हैं मॉल असबाब समेत !!!
- Leena Mehendale Manoj Dhyani -- मनोज, हमारी तो पूरी संस्कृतिही नदियोंके आसपास पलनेवाली संस्कृति रही है, ओर ये मइके आकर लौटी हैं मॉल असबाब समेत वाले प्रसंग भी हमने सदियोंसे झेलकर भी नदियोंको हमेशा माँ बहन बेटीकी ही उपमा दी है, असल बात है जारी रहे लडना --और उस समय यदि गुरुजनका हाथ पीठपर हो तो क्या बात है।
- Leena Mehendale Jai Singh -- इसी बातपर तो कवि हम सामान्य लोगोंसे अलग होते हैं। और कुसुमाग्रजकी कविता तो ऐसे प्रसंगोंसे भरी पडी है। कितने उदाहरण गिनाऊँ ? यह एक बानगी --सबसे मधुर स्वर
न महफिल के गाने का
न पहाडी झरने का
न कोयल के कूजन का
न सागर की लहरों का
न आमंत्रक होठों की
मौन किलकारी का।
सबसे मधुर स्वर
कहीं पर किसी के
हाथ पाँव पडी श्रृंखला
छनछनाकर टूटने का।
------------------------आप मेरे ब्लॉग पर अनुवादित उनकी कविताएँ देख सकते हैं। - Leena Mehendale Jai Singh --आप मेरे ब्लॉग पर अनुवादित उनकी कविताएँ देख सकते हैं।http://hindi-kusumagraj.blogspot.com/hindi-kusumagraj.blogspot.comAs I read about the sad demise of tatyasaheb, and articles quoting his poetry, i...See More
- Sanjay Kashilal Bhardwaj prayas sarahneey hai. anuwad anivarya aavashyakata hai, isme do raay nahi par 'kana" ko marathi me padhane ke baad ek alag hi romanch anubhav hota hai.
- Leena Mehendale Sanjay Kashilal Bhardwaj isme koi do rai nahi. phir bhi jinhe marathi na aati ho, ve hindi ke madhyam se us bhav tak pahunch sakte hein.
- Yogesh Damlé http://tarjumaa.blogspot.in/2008/02/blog-post.html
Leenaji, hope you like it. :)
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