Sunday, March 14, 2010

छन्दोमयी से -- तेरे मिलने को

तेरे मिलने को

तेरे मिलन की
सिद्धता है पूरी
माटी की डोरी
तोडी मैंने।

अहं का आईना
सुहृदों की थाती
पुराने बाजार में
बेच डाली।

लाख रिश्ते नाते,
उखाडी हैं जडें,
होंगे अभी सारे
धराशायी।

बही खाते सारे
किए विसर्जित
रख्खे थोडे गीत
टिप्पणी में।

वसूला थोडा सा
भारी ऋण भार
घोषित हुआ मैं
दिवालिया।

चंद्र का शारद,
सूर्य की तपन,
किया विसर्जन
गगन में।

देह का है सौध,
मन है गोपुर,
लाल बंदी-घर
वासना का।

उन्ही के द्वार पर
राजीनामा लिखा,
मुहर और ठप्पा
पूरा किया।

जीवन है कठिन,
डूबा ऊबरा मैं,
सारे का सारांश
शून्य बचा।

वर्षा का मेघ मैं
अब हुआ रीता
चलने को तत्पर
तेरे साथ।

अनुमति हो साथ
ले लूँ थोडे सुर,
शहनाई की धुन से
बिस्मिल्ला के।
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1 comment:

रविंद्र "रवी" said...

बहुत हि बढिया ट्रान्सलेशन किया है मेडम.