Sunday, March 14, 2010

छन्दोमयी से -- आईना

आईना

आईने ऐसा नहीं करते
देखी जो छवि उसे नहीं धरते।

पर यह आईना
अलग ही निकला

कभी केश में गजरा सजाने
तुमने इसमें झाँका था।

अब यह अपवाद बना आईना
नियत समय पर,
प्रगट करता है वही रूप,
पूरी की पूरी चौकट में भरकर।
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